मैं भाग्य में बहुत विश्वास करता हूँ, जो भी जीवन में आपको प्राप्त होता है पूरी तरह से भाग्य के भरोसे ही मिलता है। 'सौभाग्य या दुर्भाग्य' वह कुछ भी हो सकता है। मैं तो कहूँगा अपने कर्म के जरिये जाने-अनजाने भाग्य को हम स्वयं ही बनाते हैं। कर्म पूरी ईमानदारी से हो तो 'सौभाग्य' और बेईमानी से हो तो 'दुर्भाग्य'। यहाँ अब स्वयं चिंतन की ज़रूरत है कि हमें अपने जीवन में सब अच्छा चाहिए या बुरा। जाहिर सी बात है स्वयं के लिए तो कोई भी बुरा नहीं चाहेगा। तो फिर सब अच्छा ही चाहिए तो ईमानदारी से कर्म करो किसी दूसरे के लिए नहीं अपने लिए और अपने भाग्य को प्रबल बनाओ।
kaam hi kaam aata hai...
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